आज़ादी चाहती हूँ मैं
उस परिंदे की तरह जो उड़े आकाश में
अपनी मर्ज़ी से रहे।
एहसान फ़रामोश बन जाना है,
और इस घर को त्याग देना है,
जहाँ मेरे चीखते दिल की पुकार
न किसी ने सुनी,
बोलने का हक़ छीन लिया गया,
डरा-सहमा के बैठा दिया गया।
अनसुनी की गई हर बात चुभती है,
हर बुरी बात चुभती है,
जैसे वार हुआ हो इस दिल पर
घाव को कभी भरा नहीं जाता,
कभी मरहम का आँचल
उस पर डाला नहीं जाता।
अब और नहीं सह सकता
मेरा ये हृदय।
हक़ चाहिए मुझे मेरा उड़ने का,
उस दुनिया को देखने का
जिसकी सब बातें करते हैं
उस सपने को जी भरकर जी लूँगी,
अपनी हर ख़्वाहिश पूरी कर लूँगी।
मौके का कर रही हूँ इंतज़ार मैं,
पर एक डर बैठ गया है इस दिल में
क्या ज़ंजीरों से खुलकर मैं उड़ पाऊँगी?
क्या मैं सब भूल पाऊँगी?
क्या इन पंखों के खुलने पर मैं आज़ादी महसूस कर पाऊँगी?
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The Letters My Heart Never Sent
PoetryJust pouring my heart out. Words that stayed trapped within me, somewhere between the chaos of life. For every feeling that remained unsaid, every thought that never found its voice and every emotion I couldn't put into words I found another way to...
