कुछ कहू,,, यूं ही कह दिया...!!!!!

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गुमसुम-गुमसुम सा है दिल, 

चुप-चाप क्यु बैठा है दिल..??? 

कुछ चाहते 

सपनो कि जो थी,,, 

कांच के जैसे 

क्यु टूट गइ.. 

ईक आवाज कह रहि, 

है मुझसे.. 

तु उसका नहि 

वो तेरी 

कभी नहि होगी..!! 

क्युकि तेरे जो सपने है 

सायद सन्ग उनके,, 

न पूरे हो.. 

उनकि आदत कुछ ओर है, 

जो तुझे- 

उनमे चहिये 

सायद वहि कमि है.. 

कितने ख्वाब थे.,, 

कैइ लम्हो के.. 

तेरे 

जो तुने सोचे थे 

सन्ग उनके बितने को.. 

पर अब सब बेरंग से 

हि दिख रहे है 

रास्ते मे उजाला नहि 

दूर-दूर तक साथ नहि 

फिर क्यु जाना चाहता है 

तु उसि राह मे 

रुक जा कुछ न पायेगा.. 

जब तु देखेगा 

अपना सपना 

बेगाना का बन सा गया है.. 

कहि ओर मग्न है 

उसकि तेरि जरूरत नहि 

फिर बहुत खलेगा तुझे 

कितनी उदासि तेरे चेहरे मे होगि 

मुझसे ज्यादा कोन समझेगा 

यूं खुद को कोसना छोर दे 

जो हो रहा है 

या जो भी होगा 

तेरि जिन्दगि मे 

तेरे सपनो के संग 

सायद वो सहि हो.. 

क्युकि तेरे सपनो कि जो रेखा 

को तुने है देखा 

उसमे ओर इसमे बहुत 

बडी सी खाई है 

जिस से सायद उनको तेरा 

कुछ कहू,,, यूं ही कह दिया...!!!!!Read this story for FREE!