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बचपन के खर्चे

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म सब के पास अपने जीवन के कुछ अनमोल पलों से जुडी कई यादें होती हैं और इनमें से कई यादें हमारे बचपन से जुडी होती हैं.! मुझे अपने बचपन के दिन बहुत अच्छे लगते हैं और मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूँ की आपको भी अपने बचपन की यादों से प्यार होगा.! क्यूंकि यही वो दिन थे जिनको आपने बिना किसी टेंशन के बिताये होंगे! सही मायने में मैं अपने बचपन के दिनों को जीने की ख्वाहिश रखता हूँ और जब जब मेरे ज़ेहन में ये ख्याल आता है तो बरबस ही मेरा मन जगजीत सिंह की आवाज़ में पिरोये उन शब्दों को गुनगुनाने लगता है !

ये दौलत भी ले लो.. ये शोहरत भी ले लो .!!

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी !

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन..

वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..!!

हालाँकि बचपन से जुडी कई यादें हैं.. पर मैं चूँकि खाने का शौक़ीन हूँ तो मैं उन दिनों के कुछ ख़ास तो नहीं पर यादगार चीज़ों का ज़िक्र ज़रूर करूँगा ! उन दिनों बाज़ार से यदि हमें कुछ लाने को भेजा जाता तो हम खुश हो जाते की यदि कुछ पैसे बच जायें तो अपनी जीव्हा की लिलिप्सा शांत कर सकें !

उन दिनों जब मैं ६ या ७ साल का था तब पैसों का चलन था ! ५ पैसे और १० पैसों में अच्छी खासी चीज़ें मिल जाती थीं जिनमें हर बच्चा खुश हो सकता था ! इन में से कुछ का ज़िक्र कर रहा हूँ !

सबसे पहले तो वो सफ़ेद प्लास्टिक में लिपटी छोटी छोटी औरेंज की टॉफी.. १० पैसे में चार .. कोई बुरा सौदा नहीं था.. कसम से आज भी उसका स्वाद नहीं भूल पाया मैं..!

दूसरी चीज़ जो मुझे याद है वो थी एक छोटे से कागज़ के डब्बे में पैक की हुई चूरन की डिबिया ! स्वाद में खट्टा मीठा और हल्का तीखापन लिए हुए इस चूरन में जाने क्या ख़ास बात थी की एक बार जो हम इसे चख लेते फिर तो हर बार इसे ही खाने को मन मचलता !

तीसरी चीज़ जो मुझे बेहद पसंद थी वो थी दोनों तरफ से बंद एक लम्बी सी स्ट्रा में भरे हुए छोटे छोटे सौंफ जैसे टुकड़े.. कीमत बस ५ पैसे ! स्ट्रा का एक सिरा काट लो और फिर लो मज़े..!!

एक औरचीज़ मुझे अच्छी लगती थी वो थी पुराने १० पैसे के सिक्के के बराबर एक सफ़ेद टॉफी जो खाने में किसी मिन्ट वाली ठंडी टॉफी की तरह लगती थी जिसके बीच में दो छेद होते थे जैसे बटन में होते हैं ! एक टॉफी खरीद ली.. एक धागा लिया, दोनों छेद से गुज़ार कर बाँध दिया और फिर धागों को आगे पीछे किया तो टॉफी किसी तेज़ घिरनी की तरह घूमती और हम खुश हो जाते. जब इस खेल से मन भर गया तो टॉफी मुंह में डालली.. फिर आ गया मज़ा ! १० पैसे में दो दो बार मज़े दिलाने वाली ये टॉफी अब कहीं नहीं मिलती !

इन सबके अलावा लकड़ी के चम्मच में चिपकी और प्लास्टिक की रंगीन रैपर में लिपटी चटनी.. या फिर टेबलेट की तरह की आमचूर की गोली [आम पाचक ].. या फिर चटपटी गोली जिसके बीच में मूंगफली का दाना होता था.. या फिर रंग बिरंगी लेमनजूसी टॉफी [हम इसे लेम्चूस कहते थे ] ..या फिर काले रंग की तीखी और चटपटी लौजेंस ..!

हाय !! जब जब इन चीज़ों का ख्याल आता है.. बड़ा अफ़सोस होता है..की आखिर मैं बड़ा हुआ ही क्यूँ ?? काश ये चीज़ें फिर मिल पातीं .. काश उनका स्वाद फिर चखने को मिल पाता !! कहाँ गयीं ये देसीपन लिए हुए मज़े दिलाने वाली चीज़ें ?? आज ये सब जैसे गुम से गए हैं !

आज सबकुछ बदल गया है ! क्यूंकि अब तो Chocolate और Caramel आज के बचपन को सराबोर कर चुका है ! विदेशी आइसक्रीम की ठंडक ने देसी गर्माहट भुला दी है ! चाहे कैडबरी, किट-कैट, डेयरी मिल्क हो या बोर्नविल ! अब तो बच्चे इनकी ही जिद करते हैं क्यूंकि ये globalisation का ज़माना है! पर ये चीज़ें उन देसी चीज़ों की जगह कभी नहीं ले सकती जिनके स्वाद में कुछ अपनापन था, कुछ ऐसा जो भुलाई नहीं जा सकती! कम से कम मैं तो कभी नहीं भूल सकता ! क्या आप भी ऐसा ही सोचते हैं..??

अपनी सोच से मुझे वाकिफ ज़रूर कराएं !! :)

पसंद आई हो तो वोट जरूर करें..!! :)

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