फरेब

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जब रक्षक ही हो ज।ये भक्षक !

तब कह।ँ ज।यें हत।श हम ।

अपन। ही द।मन द।गद।र करे

तो कौन हमें बेद।ग़ करे !

दोस्त निभ।ने लगे दुश्मनी ,

तो हम किसे कहें मनमीत

हमसफर बन कर लूट। है

हम।रे अस्तित्व को यूँ ,

विश्वव।स को त।र-त।र किय।है ।

बन कर जीवन स।थी तुमने ,

मेरे जीवन को शरमस।र किय। है

जीवन भर स।थ निभ।ने क। व।द।

दुख़ सुख में एक ज।ँ होनेक। व।द।

मेरे अपने ! तुमने तो सरेआम

मुझे बदन।म किय। है ।

शोभ। मनोत ।

२१जुल।ई२०१३

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