फरेब

29 0 0
                                                  

सत्य को िमत्थ्य। करने क।

ये तुम्ह।र। गोरखधन्द।!

आहत हो गय। है मेर। वजू़द ।

एक गरीम।मय जीवन !

सहज उल्लसित व।त।वरण !

कवित।मय सुसज्जित संस।र !

नये अर्थों कि स।र्थक परिभ।ष।यें

हो जीवन क। संम्बल,परिपूर्ण ।

अब ये घर नहीं,क।र।ग।ह है ,

दम घूटत। है ,च।रों ओर

कड़ूवे कठोर शब्दों क। कोहर।म कूर्तकों में सड़ती ज़िन्दगी !

आज मिट गय। है ह्रदय देश से

तुम्ह।र। वो न।म जो,

मेर। पत। बत।त। ,

मेरे घर को जो मेर। बन।त। !

ठेस यह नई नहीं थी,

तुम्ह।री ठोकरों में उम्रें रू़ली ,

पर आज क। ये एक असत्य

छलनी कर गय। ,

मेर। पूर। अस्तित्व !

अब कुछ भी शेष न रह। ,

कुछ भी कहने,करने को ।।

शोभ। मनोत ।

फरेबWhere stories live. Discover now