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durwesh

on Apr 18, 2008
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सलमा तिवारी

1


ये बात है बहुत पुरानी
यानि हमारे पिछले जन्म की कहानी।
तब हम मिस्टर तिवारी हुआ करते थे।
और अपने मौहल्ले में रहने वाली सलमा पर मरते थे।
बड़े बूढ़े हमारे सलमा पर मरने को गलत बताते थे।
सारे दिन बैठ कर हमारे पिताजी को समझाते थे।
कि लड़के से कहो कुछ काम धाम करे।
मरना ही है तो देश पे मरे।
अब इन बड़े बूढ़ों को कौन समझाए।
कि हम नौजवानों के लिए अपना देश भाग्य विधाता है।
लड़कियों का नम्बर तो देश के बाद ही आता है।
पर पता नहीं क्यों
हमारे सलमा पर मरने को ले के इतना हल्ला था।
अजी सलमा के पीछे तो सारा मौहल्ला था।
वैसे सलमा के चक्कर में हमने भी कम पापड़ नहीं बेले।
गिल्ली डंडा छोड़ कर <किेट तक खेले।
इस दौरान सलमा के भाई ने हमें चार बार पीटा।
मगर दोस्तों सबर का फल होता है मीठा।
अन्ततः सलमा को हम पर तरस आया।
उसने हमें इन्टरव्यू के लिए बुलाया।
दिन भर बैठ कर हमने आई लव यू;, आई लव यू रटा।
शाम को नजर आई वो सावन की घटा।
आते ही बोली
क्या तुम मेरे लिए ताजमहल बनवाओगे।
हमने कहा ताजमहल के बारे में जान के क्या करेंगी।
ताज महल तो तब बनवाएंगे जब तू मरेगी।
वो बोली क्या तुम मेरे लिए चांद पर घर बनवाओगे।
हमने कहा बनवाएंगे क्या आलरेडी बनवा दिया है।
तारों को उसमें तोड़ कर लगा दिया है।
परन्तु देवी असली प्रोब्लम है चांद पर जाना।
सो तू दहेज में राकेट लेती आना।
पर देवी अब इसके आगे कुछ मत कहना।
चांद मांगा है चांद पर ही रहना।
क्योंकि अगर तू धरती पर घर बनाने को कहेगी।
तोे मैं तेरी फरमाईश पूरी नहीं कर पाऊंगा।
नौकरी वालों की जिन्दगी निकल जाती है।
मैैं बेरोजगार कहां से घर बनाऊंगा।
वो बोली तो तुम मेरे लिए क्या करोगे।
मालूम है लैला के चक्कर में मजनंू के पैरों में पड़ गए छाले।
अनगिनत आशिकों ने इश्क में पिए जहर के प्याले।
हमने कहा देवी
पर आज तक किसी आशिक ने
अपनी महबूबा के बच्चे नहीं पाले।
मैंै पालूंगा।
इतना सुनते ही सलमा हो गई हमारी।
अब थी अपने पिताजी को मनाने की बारी।
हमारे पिताजी जगन्नाथ तिवारी।
पालिटीशियन थे बड़े भारी।
विचारों के गांधीवादी थे।
पान खाने के आदी थे।
सो हमने उन्हें
चकाचक बनारसी पान का बीड़ा खिलाया।
फिर धीरे से अपना मन्तव्य बताया।
वो बोले तो ये है तुम्हारे विचारों की टोकरी।
नौकरी से पहले ही छोकरी।
हमने कहा
क्या आप अपने बाप होने का र्फज नहीं निभाएंगे।
अपने इकलौते बेटे की नौकरी भी नहीं लगवाएंगे।
वो बोले अगर मैं खुद नौकरी ढूंढ पाता।
तोे पालिटिक्स में क्यों आता।
हमने कहा फिर हम भी आपके पदचिन्हों को अपनाते हैं।
पालिटिक्स में ही अपना कैरियर बनाते हैं।
पिता जी बोले क्यों तुम गुंडे हो;, मवाली हो।
या किसी नेता की घरवाली हो।
हमने कहा इसमें से तो कोई क्वालिफिकेशन नहीं है।
वो बोले तो किस चीज़ पर कर रहे हो होप।
तुम्हारा पालिटिक्स में नहीं कोई स्कोप।
हमें समझ में आया कि पिताजी हमें चला रहे हैं।
असली मुद्दे से भटका रहे हैं।
हमने तुरन्त तुरूप का पत्ता निकाला।
पिताजी के सामने डाला।
हमने कहा हमारी सलमा से शादी कराके
आप बन सकते हैं हिन्दू मुस्लिम एकता की इकलौती मिसाल।
और इलेक्शन भी तो आने वाला है इसी साल।
नाओ देयर इस नथिंग टू हाइड।
पिताजी थे हमारी साइड।
अब बचा था केवल एक शामियाना।
यानि सलमा के अब्बा को मनाना।
हम उनके पास पहुंचे तो वो बोले चलो।
हमने कहा चलो परन्तु कहां जाना है।
वो बोले तुम्हारा र्धम चेंज कराना है।
हमने कहा तब तो हम नहीं जाएंगे।
वो बोले फिर हम रजिस्टार को यहीं बुलाएंगे।
हमने कहा बुलाइए।
उन्होंने बुलाया।
रजिस्टार आया।
आते ही बोला।
कौन सा र्धम चाहिए।
हमने कहा एक बात बताइए।
क्या आप पहले कहीं आलू प्याज बेचते थे।
या किसी मौहल्ले में ठेला खेंचते थे।
वो बोले मतलब
हमने कहा मतलब ये।
र्धम न आलू है;, न प्याज है;, न ही शरबत का है गिलास।
र्धम है मेरा मेरे भगवान के प्रति विश्वास है।
क्या तुम्हारे कागज़ पर लिख देने से हमारा र्धम बदल जाएगा।
वह बोले हां बदल जाएगा।
हमने कहा अगर बदल जाएगा तो बदल दो।
बदल दो;, बदल दो।
बदल दो इस देश की लड़ाइयों का केन्द्र बिन्दु।
भगवान राम को मुसलमान बना दो
और हजरत साहब को हिन्दू।
वो बोले इस मामले में हम बहुत सेन्टीमेन्टल हैं।
हमने कहा आप सेन्टीमेन्टल होंगे।
हम तो पूरे मेन्टल हैं।
और अब अगर आप यहां से नहीं निकले।
तो आपको यह भी पता चल जाएगा कि हम कितने जैन्टल हैं।
रजिस्टार साहब वहां से भागे।
अब्बा बढ़े थोड़ा आगे।
बोले मैने सुना तुमने दहेज में राकेट मांगा था।
हमने कहा आपकी बेटी ने तो चांद मांगा था।
हमने आपकी बेटी की फरमाइश को खूंटी पर टांगा था।
अब्बाजान आप बिल्कुल मत घबराइए।
हमें दहेज नहीं चाहिए।
वो बोले बेटा माना तुम दहेज नहीं लोगे।
पर कहीं मेरी बेटी को जला तो नहीं दोगे।
हमने कहा अब्बाजान आपके शक की सुई
बिना बात उछल रही है।
इस शादी में आपको यही तो गारंटी मिल रही है।
अगर हमारे घर में कोई भी आपकी बेटी को हाथ लगाएगा।
पलक झपकते ही शहर में दंगा हो जाएगा।
वो बोले बेटा तुम्हें लगता होगा कि ये बूढ़ा खान यूं ही बकता है।
पर यह बात एक बेटी का बाप ही समझ सकता है।
बस फिर क्या था।
गाजे बाजे शहनाई।
लड्डू पेढ़े रसमलाई।
शादी की पूरी हो गई तैयारी।
पर बीच में आ गई र्धम की ठेकेदारी।
उसके बाद वही हुआ जो हर प्रेम कहानी में होता है।
कोई हंसता है;, कोई रोता है।
पर हमारी प्रेम कहानी अलग थी।
क्योंकि हमारी प्रेम कहानी में भगवान का सिर र्शम से गड़ गया।
मन्दिर और मस्जिद के बीच का फासला दो फीट और बढ़ गया।
कोेई तो होगा यहां पर
जिसने 16 जनवरी 1975 के अखबारों की हेडलाइन पढ़ी है।
उसमें पहले पेज पर जो फोटो छपी है।
वो कोई और नहीं है मेरी ही लाश पड़ी है।
पर प्रेम तो अमर है उमंग है आशा है।
इन्सानियत से अच्छी इसकी परिभाषा है।
एैसा इस लिए कहता हूं।
क्योंकि भगवान को हमारी प्रेम कहानी पर तरस आया।
उसने हिन्दू मुसलमान का चक्कर हटाया।
और इस जन्म में हमें और सलमा दोनो को सरदार बनाया।
पर भगवान एैसा कितने केसेस में कर पाएगा।
आखिर कितने हिंदुओं और मुसलमानों को सरदार बनाएगा।

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