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    hindi-dharm vichaar+vaidik sanskaar

    श्रीमद्भागवत कथा श्रवण से मिलती है भक्ति: कर्ण सिंह
    बहादुरगढ़। गांव सौलधा के सत्संग भवन में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पंडित कर्ण सिंह ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा को नियम पूर्वक सुनने मात्र से ही मनुष्य के तमाम संकट कट जाते हैं जो मनुष्य श्रीमद्भागवत का श्रद्धा पूर्व श्रवण कर लेता है। और समाज में फैली बुराईयों से स्वयं को दूर रखता है, निश्चित रूप से वह व्यक्ति मुक्ति पा लेता है।
    उन्होंने कहा कि द्वापर युग के अंतिम काल में कलियुग के आगमन पर जब कलियुग एक बैल के रूप में गाय के पीछे-पीछे दौड़ रहा था तो राजा परीक्षित ने बैल को कहा कि गाय को क्यों तंग कर कर रहे हो। बैल ने कहा कि द्वापर युग का समय पूरा हो चुका है और सृष्टि में मेरा राज होगा तथा जहां पर मैं निवास करूंगा उसकी सोच व कार्यकुशलता को बुरी तरह से प्रभावित करूंगा। इस पर राजा परीक्षित ने जब गाय को छोड़ने के लिए कहा तो कलियुग बोला कि मैं कहां रहूं तो परीक्षित ने जवाब दिया कि सोने में जाकर तुम निवास करो। चूंकि राजा परीक्षित ने सोने का मुकुट पहना हुआ था। इसलिए कलियुग उन्हीं के मुकुट में जाकर विराजमान हो गया। कुछ दिन बाद जब कलियुग के प्रभाव में राजा शिकार के लिए जंगल में गए और अपने वजीरों आदि से बिछुड़कर एक पेड़ के पास पहुंच गए, जहां एक महान संत तपस्या कर रहा था। राजा परीक्षित ने सोचा कि यह कैसा संत है कि मेरे आने पर इसने मुझे नमस्कार करने की बजाए अपनी आंखें तक नहीं खोली। क्रोध वश राजा ने एक सांप उस संत के गले में डाल दिया। बावजूद इसके संत अपनी तपस्या में मग्न रहा। थोड़ी दूरी पर संत का पुत्र खेल रहा था। जिसे किसी ने बताया कि तुम्हारे पिता के गले में किसी ने सर्प डाल दिया है। उस लड़के ने वहीं खड़े-खड़े श्राप दे दिया कि जिस व्यक्ति ने मेरे पिता के गले में सांप डाला है उस व्यक्ति को ठीक सात दिन के अंदर सांप काट लेगा। तपस्या पूरी होने पर जब महात्मा को पता चला कि उसके पुत्र ने जिस व्यक्ति को श्राप दिया है वह कोई और नहीं बल्कि धर्मा और सच्चाई का प्रतीक राजा परीक्षित है। इस श्राप से बचने के लिए वह राजा यदि एक सप्ताह तक श्रीमद्भागवत का नियमपूर्वक श्रवण करें तभी बच सकता है। इसके बाद मुनि सुकदेव ने राजा परीक्षित को विशेष रूप से बनाए गए कांच के महल में एक सप्ताह तक लगातार पाठ सुनाया। श्रीमद्भागवत के समापन के अंतिम क्षणों में कांच का महल टूट गया और उसी सांप ने अंदर दाखिल होकर राजा को डंस लिया और राजा परीक्षित ने मोक्ष को प्राप्त किया।




    सुख-शांति मन के भीतर की वस्तु: गिरि
    बहादुरगढ़। वेदांत आश्रम में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए स्वामी देवेंद्रानंद गिरि ने कहा कि यदि मनुष्य अपने से यह प्रश्न पूछे कि उसे किस चीज की तलाश है तो भीतर गहराई से एक ही उत्तर आएगा कि सुख व शांति की। मनुष्य सोचता है कि ज्यादा धन कमा लूंगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा और ज्यादा यश कमा लूंगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा। बहुत कमा लेने पर भी जब वह सुख, शांति नहीं पाता तो मन कहता है कि सुख इसलिए नहीं मिला कि श्रम में कहीं कमी थी और शक्ति से दौड़ भाग कर और धन इकट्ठा करो। जबकि केवल धन कमाने से ही सुख प्राप्त नहीं होता, क्योंकि जिन वस्तुओं में व्यक्ति सुख तलाश रहा है वहां सुख है ही नहीं। सांसारिक मोह माया तो केवल धोखा है। उन्होंने कहा कि अगर हम भीतर से खुश हैं तो हमें रेगिस्तान में भी फूल खिले हुए महसूस होंगे और अगर हम दुखी हैं तो हमें फूलों के बगीचे में भी कांटे ही कांटे नजर आएंगे। हम खुश हैं तो बाहर चिलचिलाती धूप भी अच्छी है और हम दुखी हैं तो बाहर का मौसम भी हमें पतझड़ की तरह लगता है। क्योंकि जैसा हम भीतर से महसूस करते हैं वैसा ही हमें संसार नजर आता है। इससे एक बात तो सिद्ध होती है कि सुख भीतर से आता है बाहर से नहीं।
    पंडित जी ने कहा कि जब हम निद्रा से उठते हैं तो ताजगी अनुभव करते हैं क्योंकि धन कमाने की, यश मिलने की यात्रा ऊर्जा की बर्हियात्रा है और निद्रा ऊर्जा की अंर्तयात्रा है। बाहर का जितना बड़ा ब्रह्मांड है उतना ही बड़ा भीतर का ब्रह्मांड है। हम मध्य में खड़े हैं। बाहर की तरफ यात्रा करेंगे तो केवल यात्रा ही यात्रा है पहुंचेंगे कहीं नहीं क्योंकि मंजिल बाहर नहंी भीतर है। उन्होंने कहा कि दूसरी बात हम सोचते हैं कि हम सुख की तलाश में भटक रहे हैं पर यह गलत है। व्यक्ति को सुख की तलाश में नहीं बल्कि उसे आनंद की तलाश में भटकना चाहिए। चूंकि हमारा पंचभूतों से बना शरीर इंद्रियों से जुड़ा है इसलिए हम उसे ही सुख समझते हैं। यह देह तो केवल एक वस्त्र की भांति है परन्तु जैसे ही भीतर की यात्रा शुरू होती है वैसे-वैसे बाहर की परतें छूटती जाती है और हम अपने स्वरूप को पहचानने लगते हैं।



    बनावटी जीवन निराशा का जन्मदाता: कसारिया
    बहादुरगढ़। लाइन पार स्थित शिव मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पंडित जय भगवान कसारिया ने कहा कि बनावटी जीवन निराशा की जननी है। अपनी शक्ति में विश्वास रखना, अपनी आकांक्षा को ऊंचा रखना अच्छा है, पर उसके लिए अपनी शक्ति का आकलन करना और उसका उपयोग करना सीखना भी आवश्यक है। जीवन में सादगी का अभ्यास हो जाने पर व्यक्ति की सोच सत्यम-शिवम-सुंदरम के परिवेश में आ जाती है। धन वाहवाही अथवा सम्मान की इच्छा शक्ति उसके लिए नगण्य हो जाती है।
    पंडित जी ने कहा कि व्यक्ति का अनुभव ही उसका सबसे बड़ा गुरु है और श्रेष्ठ विचार सबसे अधिक मूल्यवान है। यह व्यक्ति के हाथ में है कि वह अपनी सादगी का आदर्श प्रस्थापित करे और उससे अपने विचारों की दुनिया को अनुप्राणित करे। विचार भावनाओं का भोजन है। हमारे प्राचीन भारत का जीवन-दर्शन ही सादे जीवन पर आधारित रहा है। तत्कालीन भारत के ऋषि वनों और आश्रमों में रहते थे। वे वाह्य जीवन की सुविधाओं को अधिक प्रधानता नहीं देते थे और परहित को वह अपना धर्म मानते थे। जीवन को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि उसका आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार का विकास हो। जीवन की सादगी हमारी भारतीय संस्कृति की जीवन-पद्धति का सौंदर्य है। यह सौंदर्य चरित्रवान व्यक्ति के व्यक्तित्व से प्रस्फुटित होता रहता है। उस व्यक्ति का आंतरिक सौंदर्य आंखों को नहीं, सबकी समझ को भाता है। सात्विक जीवन का सौंदर्य अस्थायी नहीं होता, वह सतत प्रवाहित होता होने वाला है।

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